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Hanuman Pandit Janardan Rai Nagar
Hanuman
Pandit Janardan Rai Nagar
इस उपनà¥à¤¯à¤¾à¤¸ में 'हनà¥à¤®à¤¾à¤¨' à¤à¤• अलौकिक पातà¥à¤° के रूप में दशारà¥à¤¯ गये हैं। ''यह कà¥à¤¯à¤¾ पारà¥à¤¥à¤¿à¤µ शिशॠहैं? नहीं, केसरी!... यह आञà¥à¤œà¤¨à¥‡à¤¯, केसरीननà¥à¤¦à¤¨, निसà¥à¤¸à¤‚देह सà¤à¥€ देवताओं और शकà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के पà¥à¤‚ज सा ही अवतरित हà¥à¤† है- यह जनà¥à¤®à¤¾ नहीं है, केसरी ! आविरà¥à¤à¥‚त हà¥à¤† है।'' हनà¥à¤®à¤¾à¤¨ सà¥à¤µà¤¯à¤‚ कहते हैं- ''मैं कहता हूं, राम की राह धरती देख रही है- आकाश देख रहा है। मà¥à¤à¥‡ राम ने कहा- कà¥à¤·à¥€à¤° सागर में कहा; तू जा, पृथà¥à¤µà¥€ पर जनà¥à¤® ले-वानर योनि में और मेरी पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤•à¥à¤·à¤¾ कर...।'' हनà¥à¤®à¤¾à¤¨ के हिसाब से राकà¥à¤·à¤¸à¥‹à¤‚ के सामरà¥à¤¥à¥à¤¯ ने यह अनिवारà¥à¤¯ कर दिया था कि वानर या तो विजà¥à¤žà¤¾à¤¨ की शकà¥à¤¤à¤¿ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ करें और राकà¥à¤·à¤¸ बन जायें अथवा आरà¥à¤¯à¥‹à¤‚ की तप शकà¥à¤¤à¤¿ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ कर अमृत पà¥à¤¤à¥à¤° बन जायें। इसी पà¥à¤°à¤•ार का आधà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤¿à¤• चिनà¥à¤¤à¤¨ à¤à¤µà¤‚ रामà¤à¤•à¥à¤¤à¤¿ की पराकाषà¥à¤Ÿà¤¾ यतà¥à¤°-ततà¥à¤°, समà¥à¤ªà¥‚रà¥à¤£ उपनà¥à¤¯à¤¾à¤¸ में दृषà¥à¤Ÿà¤µà¥à¤¯ है- ''मैं जनà¥à¤®à¤¨à¤¾-मरना नहीं चाहता। मैं मृतà¥à¤¯à¥ को नहीं चाहता। रोग और शोक से à¤à¤°à¥‡ संसार को मैं नहीं चाहता, पà¥à¤°à¤à¥‹!'' - शिव मà¥à¤²à¤•े- ''किसे चाहता है तब?''- शà¥à¤°à¥€ राम को, शिव शमà¥à¤à¥‹! शà¥à¤°à¥€ राम को।''- हनà¥à¤®à¤¾à¤¨ ने कहा। सार यह है कि इस उपनà¥à¤¯à¤¾à¤¸ में रामायणकालीन राकà¥à¤·à¤¸, वानर à¤à¤µà¤‚ मानव संसà¥à¤•ृतियों की कà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾, पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤•à¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ à¤à¤µà¤‚ अनà¥à¤¤ कà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾à¤“ं का विशदॠविवेचन सृजित करने के साथ हनà¥à¤®à¤¾à¤¨ के समà¥à¤ªà¥‚रà¥à¤£ चरितà¥à¤° का विशद आखà¥à¤¯à¤¾à¤¨ है।
| Media | Books Paperback Book (Book with soft cover and glued back) |
| Released | January 30, 2021 |
| ISBN13 | 9781638065081 |
| Publishers | Notion Press |
| Pages | 554 |
| Dimensions | 152 × 229 × 31 mm · 802 g |
| Language | Hindi |
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